‘विधवा पर श्रृंगार है यंत्रकर्मी का लेखक होना’

पेशे स‌े यंत्र-कर्मी और शौक कविताएं, व्यंग्य और उपन्यास लिखना। इन स‌भी विधाओं में एक स‌ाथ स‌ामंजस्य स्थापित करना वाकई में कठिन काम है। लेकिन श्रवण कुमार उर्मलिया के लिए दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। वे खुद मानते हैं कि इनके स‌ह-अस्तित्व ने उनके व्यावसायिक कैरियर के निर्माण के स‌ाथ-साथ स‌ाहित्यिक उपलब्धियों में भी मदद की है। यह एक स‌ंयोग है कि उनका यंत्र-कर्मी स‌ृजनशीलता के लिए अनुभव बटोरता रहा और स‌मय पड़ने पर उनका रचनाधर्म, यंत्र-कर्मी को मॉरल स‌पोर्ट देता रहा है। पेश है श्रवण कुमार उर्मलिया स‌े बातचीत के खास अंश-

प्रश्न-आप एक इंजीनियर हैं लेकिन स‌ाहित्य पर भी आपकी जबर्दस्त पकड़ है। दो विपरीत विधाओं के बीच आखिर आप कैसे स‌ामंजस्य बिठा पाते हैं?

उर्मलिया-यदि पूरी ईमानदारी स‌े मुझे अपने मन के भावों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो, तो मैं कहूंगा कि किसी यंत्र-कर्मी को रचनाधर्मी हो जाना ठीक वैसा ही है जैसे किसी स‌िद्ध स‌न्यासी का भोग विलास में लिप्त हो जाना, योगी का भोगी या पतझड़ का बहार की ऎक्टिंग करना। यंत्र-कर्मी का कवि या लेखक हो जाना किसी विधवा पर श्रृंगार के आयोजन जैसा है। यंत्र-कर्मी और रचना धर्मी का एक शरीर में रहना वास्तव में दो विपरीत मिजाजों वाले किराएदारों का एक घर शेयर करने जैसा है। आंतरिक रुप स‌े यंत्र-कर्मी और रचनाकार एक ही शरीर में स‌माहित होते हैं पर बाहरी तौर पर दोनों अलग-अलग योग्यता या कौशल के रुप में प्रदर्शित और अभिव्यक्त होते हैं।
एक ही शरीर में यंत्र-कर्मी और स‌ृजनशील कवि या लेखक के बीच किस तरह स‌ामंजस्य स्थापित होता है और ये दोनों अपनी अभिव्यक्ति के लिए किन-किन फेकल्टीज(चित्रवृत्तियों) का उपयोग करते हैं, इसे निश्चित रुप स‌े स‌मीकरणबद्ध नहीं किया जा स‌कता। पर यह बात तय है कि आत्मा,मन या प्राणयुक्त इस शरीर में कोई न कोई मेकनिज़्म ऎसा अवश्य होता है जिसके माध्यम स‌े यंत्र-कर्मी या रचनाधर्मी में स‌े जिसे चाहे स‌ामने लाया जा स‌कता है।

यंत्र-कर्मी चूंकि अपनी व्यावसायिक योग्यता को स्वाभाविकग रुप स‌े रोज़गार और जीवनयापन के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यंत्र-कर्म स‌ंबंधित प्रतिभा नैसर्गिक रुप स‌े उत्सर्जित होती है, इस प्रतिभा को मुखर करने के लिए किसी विशेष मूड या मन:स्थिति की आवश्यकता नहीं होती है। पर व्यक्ति के भीतर स‌े रचना-कर्मी को अभिव्यक्त करने के लिए एक विशेष मन:स्थिति की आवश्यकता होती है जो बहुत कुछ परिस्थितिजन्य और अनुभूति-आरोपित होती है।

मेरे भीतर के यंत्र-कर्मी और रचनाकार हमेशा एक दूसरे के पूरक रहे हैं। इनके स‌हअस्तित्व मने मुझे व्यावसायिक कैरियर के निर्माण के स‌ाथ-साथ मेरी स‌ाहित्यिक उपलब्धियों में भी मेरी मदद की है। यह एक दुखद स‌ंयोग है कि मेरा यंत्र-कर्मी मेरी स‌ृजनशीलता के लिए अनुभव बटोरता रहा और स‌मय पड़ने पर मेरा रचनाधर्मी मेरे यंत्र-कर्मी को मॉरल स‌पोर्ट देता रहा है।

प्रश्न-साहित्य लेखन की शुरूआत आपने कैसे और कब की?


उर्मलिया- जहां तक मुझे याद है, मैं ने पहली बाल-कहानी तेरह वर्ष की उम्र में लिखी थी और उसे नन्दन में छपने के लिए भेजा था। रचना कुछ स‌ुझावों स‌हित स‌धन्यवाद लौट आई थी। उन दिनों मैं कक्षा स‌ातवीं का छात्र था और नंदन पत्रिका का वार्षिक ग्राहक था। स‌ाहित्य स‌े मेरा स‌ाक्षात्कार हो चुका था और पढ़ाई स‌े बचा हुआ स‌मय मैं किताबों को पढ़ने में लगाता। मेरा बचपन बंगाली परिवारों के बीच बीता और इसीलिए मुझ पर बंगला स‌ंस्कृति का गहन प्रभाव पड़ा। स‌ाहित्य और फुटब़ॉल में गहरी रुचि उसी स‌ान्निध्य का नतीजा है। चूंकि हिंदी के स‌ाथ-साथ बंगला भाषा पर भी मेरा स‌मान अधिकार था, इस‌लिए शरत्, बंकिम और रवीन्द्र स‌ाहित्य मैं मूल बंगला में पढ़ा। विशेषकर शरत् स‌ाहित्य ने मेरे भीतर स‌ाहित्य के प्रति पिंपासा को बढ़ाया। हां, 1965 स‌े 1969 तक स‌िर्फ मैंने स्कूली शिक्षा ली और स‌ाहित्य पढ़ा पर लेखन नहीं कर पाया। स‌न् 1969 में जब मैं ने शासकीय अभियांत्रिक महाविद्यालय, जबलपुर में इंजीनियरिंग में दाखिला लिया तभी लेखन की विधिवत शुरूआत हुई।

प्रश्न-अपने बारे में स‌ंक्षेप में बताएं?

उर्मलिया-लगभग डेढ़-दो शताब्दी पहले उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में स्थित स‌िरजम नामक गांव स‌े, राम-मणि-नाथ एवं कृष्ण नामक चार भाईयों में स‌े राम नाम स‌रयूपारी शाण्डिल्य-गोत्री तिवारी ब्राह्मण परिवार विस्थापित हुआ था, जो मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के अंतर्गत ब्योहारी तहसील में पड़नेवाले ग्राम बोडरा में स्थापित हुआ। यह राम के कुल की एक प्रमुख शाखा बनी। स‌ात-आठ पीढ़ियों के बाद उस परिवार के एक होनहार लड़के श्री शंकर प्रसाद उर्मलिया ने घर-परिवार के परंपराओं को तोड़ते हुए स‌रगुजा जिले की कोयला खान में नौकरी कर ली। इन्ही प्रतिभावान शख्स को कालान्तर में मेरा पिता होने का स‌ौभाग्य प्राप्त हुआ।

27 जुलाई, स‌न् 1952(ऑफिसियल जन्मदिन 10 अगस्त 1951 दर्ज है), नाग-पंचमी के दिन स‌रगुजा जिले में स्थित दक्षिणी झगड़ाखाण्ड कोलियरी में मेरा जन्म हुआ। मेरे जन्म स‌े कुछ दिन पहले मुझसे डेढ़ वर्ष बड़े भाई की मृत्यु हो गई थी। इसलिए जीवन निरन्तर पैदा होने का प्रायश्चित बनता गया। मेरी जीवनदायिनी मां इस स‌ृष्टि की एकमात्र महिला ती जिसने एक बेटे की मौत का दुख और एक बेटे के जन्म की खुशी को स‌ाथ-स‌ाथ भोगा।

जब मैं अपने विगत वर्षों के स‌ंदर्भों को टटोलता हूं तो पाता हूं कि मेरे द्वारा किया गया स‌ाहित्यिक स‌ृजन मैंने नहीं बल्कि मेरे माध्यम स‌े मेरे अकेलेपन और विषपायी परिस्थितियों ने किया है। जीवन में अकेलेपन की स‌ृष्टि तभी होने लगी थी जब मेरा बचपन मां-बाप की छत्रछाया स‌े दूर कभी नानी के पास तो कभी दादा के पास रेहन रखा हुआ था। मेरे कई दावेदार थे औऱ मैं इस स‌त्य को स‌मझने लगा था कि जिसके कई दावेदार होते हैं, उसका वास्तव में कोई नहीं होता।

पिता की स‌ीमित आय और बीमार मां एवं छह भाई-बहनों के असीमित व्यय के बीच पढ़ाई की जिद। जीवन का अगला पड़ाव था स‌ंस्कारधानी जबलपुर जहां स‌े 1974 में बीई(यांत्रिकी) की डिग्री प्राप्त हुई। इस डिग्री के दौरान पांच वर्षों तक मैने हॉस्टल में अकेलेपन के यातनाघर में जीते हुए अपनी महत्वाकांक्षा का मोल चुकाया। वास्तव में इंजीनियरिंग की डिग्री पांच वर्ष लंबे यातना की डिग्री भी थी। हर तरफ दुविधाएं ही दुविधाएं ही थीं और मन अभिव्यक्ति के माध्यम स‌े स‌ुविधाएं जुटा लेता था।
अपने अगले पड़ाव आईआईटी, कानपुर में एमटेक के दौरान मुझे स‌मझ में आया कि स‌ाहित्य-सृजन अपने भीतर अपनी तलाश और बाह्य जगह में उस तलाश को विस्तार देने की स‌ार्थक प्रक्रिया है। वह आत्ममोह खत्म हुआ जब अपना दुख बड़ा लगता था। पहली नौकरी नैनी-इलाहाबाद स्थित त्रिवेणी स्ट्रक्टचरल लि. में और कंपनी की ओर स‌े स‌िंगरौली, हिमाचल,भिलाई,राजस्थान,आसाम,मेघालय एवं फरक्का में विभिनन्न परियोजनाओं पर कार्य। 1984 स‌े 1989 तक नागपुर की रिचर्डसन एंड क्रूडास(1972) लि. में बिहार,उड़ीसा,दुर्गापुर इत्यादि स्थानों पर विभिन्न विद्युत ट्रांसमिशन लाईन परियोजनाओं का निर्माण। स‌न् 1990 जनवरी स‌े विद्युत परियोजनाओं का आकलन ताकि उन्हें ऋण मुहैया किया जा स‌के।

एकमात्र पुत्री स‌हित छोटा परिवार। पर्यटन में विशेष रुचि। फोटोग्राफी और पेन्सिल स्केच ड्रा करने का शौक। कंपनी एवं व्यक्तिगत माध्यमों स‌े अमेरिका,इंग्लैड,फ्रांस,जर्मनी,आस्ट्रिया,हालैंड,बेल्जियम,सिंगापुर,मलेशिया,थाईलैंड,साउथ कोरिया,हांगकांग इत्यादि देशों की यात्राएं। देश के कई जगहों पर स‌माजसेवी स‌ंस्थाओं के माध्यम स‌े ऊर्जा एवं जल स‌ंरक्षण पर विचार विनिमय।

प्रश्न-अपनी प्रकाशित रचनाओं के बारे में बताए?

उर्मलिया-प्रारंभिक रचनाएं अभियांत्रिक महाविद्यालय,जबलपुर की वार्षिक पत्रिकाओं और दैनिक स‌माचार पत्रों में प्रकाशित हुई थीं। ऑल इंडिया रेडियो, जबलपुर के युववाणी कार्यक्रम में कविताएं प्रसारित। स‌ारिका एवं कंचनप्रभा में गजलें प्रकाशित। नागपुर के स‌माचार पत्रों में दो वर्षों तक नियमित लेखन। उस दौरान देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई रचनाएं प्रकाशित। नागपुर के कई स‌फल स‌माचार पत्रों में स‌ंपादक रहे श्री जगदीश स‌ाहू ने मेरे भीतर के व्यंग्यकार को स‌ाधा और मुझे उत्साहित किया।

दिल्ली में आने के बाद राग बिलबिलावल, स‌ौंदर्यबोध का विटामिन,लक्ष्मीजी मृत्युलोक में,भ्रष्टाचार की तलाश,हमदर्दी का आतंक,बुद्धिमानी का जहर और शराफत स‌े आफत नामक स‌ात व्यंग्य-संग्रह प्रकाशित। व्गंग्य-संग्रह भ्रष्टाचार की तलाश को वर्ष 1997-98 के लिए हिन्दी अकादमी,दिल्ली द्वारा स‌ाहित्यिक कृति पुरस्कार। हिन्दी अकादमी, दिल्ली के प्रकाशन स‌हयोग स‌े अंधेरों के रश्मिकलश कथा स‌ंग्रह प्रकाशित। दो और कथा-संग्रह तस्वीरों का घर एवं निकाषित एवं अन्य कहानियां भी प्रकाशित। गीत-गजल स‌ंग्रह स‌पनों के पलाशवन एवं कविता-संग्रह ठहरो,मेरे अज्ञात प्रकाशित। उपन्यास कुछ बसंत अधूरे स‌े प्रकाशनाधीन।

प्रश्न-आपने इंजीनियरिंग की डिग्री ली है। हालिया रिलीज थ्री इडियट्स में रैगिंग को लेकर बहुत कुछ दिखाया गया है। क्या आपके स‌मय में भी ऎसा होता था?

उर्मलिया-नहीं, हमारे स‌मय में ऎसी रैगिंग नहीं होती थी। आज कल रैगिंग का बहुत वीभत्स रुप देखने को मिलता है और रैगिंग में फिजिकल वायलेंस नजर आता है। हमारे जमाने में रैगिंग शालीनता की हद तक स‌ीमित होती थी। ओरल रैगिंग का जमाना था वह। भ्रमित करने वाले प्रश्न पूछे जाते थे, फिल्मी गीत गवाए जाते थे,चुटकुले स‌ुनाने को कहा जाता था और स‌ामान्य ज्ञान का टेस्ट किया जाता था। फिजिकल के नाम पर थोड़ा-बहुत दौड़ाया जाता था या अभिनय करने को कहा जाता था। नए छात्रो के प्रति स‌ीनियर छात्रों का रुख नरम और बड़प्पन स‌े भरा हुआ होता था।
आज के फिल्म के व्यस्ततम खलनायक और चरित्र अभिनेता श्री शरद स‌क्सेना और जनता दल यू के अध्यक्ष श्री शरद यादव हमारे स‌ीनियर थे। आचार्य रजनीश जबलपुर युनिवर्स‌िटी में पढ़ाते थे और हमारे कॉलेज में विशेष अवसरों पर उद्बोधन हेतु आते रहते थे। हमार प्रिंसिपल स्व. वी.डी.गुप्ता को फादर ऑफ स्टूडेंट की उपाधि प्राप्त थी।पूरे कॉलेज में कला,संस्कृति,साहित्य,स‌ंगीत इत्यादि का पोषण होता था। ऎसे माहौल में रैगिंग स‌े जी नहीं घबड़ाता था बल्कि उसमें आनंद आता था। स‌ीनियर छात्र नये लोगों को स्नेह स‌े स्वीकारते थे और उनकी मदद करते थे। मुझे याद है जब कॉलेज में भर्ती होते ही मुझे टायफायड हो गया था तो स‌ीनियर छात्रों ने रात-रात भर जागकर मेरी तीमारदारी की थी।
कॉलेज के छात्रों में वैसी एकता आजकल कम ही देखने को मिलती है। हमारे स‌मय में स‌भी छात्र नैतिकताओं और जीवन-मूल्यों स‌े जुड़े रहते थे। आज मानवता का अवमूल्यन अपने चरम पर है। पढ़ाई का स्तर भी गिर रहा है औऱ आचार-विचार का स्तर भी। स्ट्रांग बौद्धिकता किन्तु बिखरे मानवीय मूल्यों का युग है यह।

प्रश्न-आपका आने वाले उपन्यास है कुछ बसंत अधूरे स‌े। इसमें आपने इंजीनियरिंग के दिनों को थीम बनाया है। चेतन भगत की पुस्तक फाइव प्वाइंट स‌मवन भी इसी थीम पर आधारित है। आखिर फाइव प्वाइंट स‌मवन स‌े कैसे अलग है कुछ बसंत अधूरे स‌े?

उर्मलिया- चूंकि मैंने चेतन भगत का उपन्यास पढ़ा नहीं है इसलिए अपने उपन्यास का तुलनात्मक रुप प्रस्तुत करने में स‌क्षम नहीं हूं। हां, अपने उपन्यास के बारे में विवरण दे स‌कता हूं। मेरे उपन्यास कुछ बसंत अधूरे स‌े की पृष्ठभूमि भारतीय तकनीकी स‌ंस्थान,कानपुर है। और कार्यकाल स‌न 1976 स‌े 1978 तक का है। इस दौरान मैंने यहां स‌े एमटेक यांत्रिकी का वातावरण बहुत नीरस होता है और छात्र-छात्राएं पढ़ने के अलावा कुछ नहीं करते। इस उपन्यास के माध्यम स‌े मैं ने इस मिथ को तोड़ने का प्रयास किया है।

प्रेम स‌ंबंधों के विभिन्न आयामों का अध्ययन और स‌मीक्षा मेरी कहानियों का प्रिय विषय हुआ करता था। इस उपन्यास में भी मैं ने मुख्य पात्र रवि जो कि शादीशुदा है और छात्रा कोमल के बीच पनपे स्नेहबंधनों का स‌ूक्ष्म विवेचन किया है। स‌मानान्तर चलते कुछ प्रेम स‌ंबंधों की स‌फलता, असफलता एवं विभिन्न आयामों पर भी दृष्टि डाली गयी है। स‌ाथ-साथ स‌ंस्थान में व्याप्त कल्चर,रीतियों,विधियों आपसी स‌ंबंधों इत्यादि को विस्तार स‌े कवर किया गया है। कानपुर का भौगोलिक एवं प्राकृतिक माहौल उपन्यास में बार-बार उभरता है। रवि की बौद्धिकता और उसके प्रति महिलाओं के आकर्षण को भी उकेरा गया है।

कुल मिलाकर कुछ बसंत अधूरे स‌े में तकनीती स‌ंस्थान का शब्द चित्र प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। और इस बात को स्थापित किया गया है कि वहां अंतरंग स‌ंबंध भी बहुतायत स‌े पनपते हैं। बुद्धि और मन का स‌ही स‌मन्वय होता है वहां।

प्रश्न-आगे की योजनाओं के बारे में बताएं। क्या फिल्म लेखन में भी हाथ आजमाने का इरादा है?

उर्मलिया- फिलहाल जब तक स‌रकारी उपक्रम में नौकरीरत हूं, तब तक कोड ऑफ कंडक्ट के दाwयरे में व्यंग्य रचनाओं पर मूल रुप स‌े हाथ आजमाते रहना है। विसंगतियों, मिथ्याचारों, पाखंडों.दोहरे मापदंडों और स‌ामाजिक कुरीतियों एवं बुराइयों का पर्दाफाश करते रहना है। बीच-बीच में कहानियां और कविताएं भी लिखता रहूंगा। कोयला-खान की पृष्ठभूमि पर निरंतर लिखूंगा। नौकरी के दौरान मैंने प्रशास‌न, ब्यूरोक्रैसी, राजनीतिक छद्म, स‌रकारी उपक्रमों का कल्चर इत्यादि को बहुत करीब स‌े देखा-भाला है और स‌ेवानिवृत होने के बाद वृहद कैनवास पर इन स‌भी के बारे में विस्तार स‌े लिखूंगा। जब तक व्यंग्य उपन्यास न लिखा जाय तब तक लेखक व्यंग्यकार के रुप में स्वीकृत नहीं होता। अत: एक व्यंग्य उपन्यास की भी योजना है। अवसर मिलने पर फिल्म-लेखन या स‌ीरियल-लेखन स‌भी कुछ करूंगा। शर्त स‌िर्फ यही रहेगी कि लेखक की स्वतंत्रता बरकरार रहे। अपनी वैचारिक स्वच्छन्दता के स‌ाथ कोई स‌मझौता नहीं करुंगा।

प्रश्न-आपने गीत, गजल,कविताएं,कहानियां,लघुकथाएं,यात्रावृतांत जैसी स‌ाहित्यिक विधाओं में हाथ आजमाया है। लेकिन स‌बसे ज्यादा कौन स‌ी विधा आपको रास आती है?

उर्मलिया-यह एक स्थापित तथ्य है कि स‌ाहित्यिक लेखक मूलत: कवि होता है। मैं भी अपवाद नहीं हूं और अपने आप को कविता के बहुत करीब पाता हूं। एक कविता जो स‌ंतोष देती है वह एक वृहद कैनवास की रचना स‌े भी नहीं मिलता। कविता का स‌ृजन करने के बाद अभिव्यक्ति की संपूर्णता और स‌ार्थकता का अहसास होता है। मन की कोमल भावनाओं को व्यक्त करने वाली कहानियां दूसरे नंबर पर हैं। तीसरे नंबर पर स्वयं को व्यंग्य के करीब पाता हूं पर व्यंग्य में मनोरंजन के लिए नहीं लिखता बल्कि अपनी गहन और गुरुत्तर स‌ामाजिक जिम्मेदारी के निष्पादन के लिए व्यंग्य लिखता हूं।

प्रश्न-आप अपने व्यस्त दिनचर्या में स‌े कैसे स‌ाहित्य रचना के लिए स‌मय निकाल पाते हैं?


उर्मलिया- मेरे लेखन की परंपरा की कुछ विशेषताएं हैं। मैं स‌िर्फ छुट्टी के दिन ही लिखने के लिए स‌मय निकाल पाता हूं। अलबत्ता अवलोकन और चिंतन हर स‌मय चलता रहता है। नोट्स भी बनाता रहता हूं। कई बार एक छोटा स‌ा शीर्षक मात्र विस्तार पाकर विकसित कथा या व्यंग्य का रुप ले लेता है। कभी- कभी दो पंक्तियों में वर्णित छोटी स‌ी घटना स‌े व्यंग्य की स‌ृष्टि हो जाती है। विचित्र स्वभाव और चरित्र वाले व्यक्ति भी रचना के माध्यम बनते हैं।

वर्तमान नौकरी में शनिवार-रविवार की छुट्टी रती है। शुक्रवार शाम स‌े ही दिमाग में स‌ृजन के परिंदे उड़ान भरने लगते हैं। अपने नोट्स टटोलता हूं, अपने विचारों को खंगालता हूं और शनिवार की स‌ुबह तक रचना की रुपरेखा तैयार हो जाती है। हां, अपने भीतर स‌े रचनाकर्मी को बाहर निकालने के लिए चिन्तन, मनन और पठन-पाठन का स‌हारा लेना पड़ता है। रचना के शुरूआती दो-चार वाक्य लिखने में स‌मय लगता है। इसके बाद मैं लेखन के मोड में आ जाता हूं।

हर इंसान अपने स‌मय का स‌च होता है। इसीलिए मैं इसे अपना दायित्व स‌मझता हूं कि स‌मय की नब्ज को पहचानूं और स‌मय के दर्द को अभिव्यक्ति दूं। और यदि हो स‌के तो स‌मय की पीड़ा को दूर करने के उपाय स‌ुझाऊं, तरकीबें भी स‌ोचूं। अंधेरों की अंतहीन कैद स‌े प्रकाश को मुक्त कराने की बातें भी करुं।

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अच्छा काम किया, बधाई
sahara samay me imandar kam karne walo ki kadar hone se tiaar pi or bhi badh sakti h basrte kam karne ki pahchan prbandhan ko honi c
सही खबर है लेकिन अफ़सोस bihar से कोई चैनल नहीं है
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कुछ भी कर ले ये लोग...वासना से फुर्सत हो तब न...इनपुट ह
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