बाजारवाद आंदोलन को निगल गया
पुण्य और देश की राजनीति
इंटरव्यू के पहले पार्ट में पुण्य प्रसून वाजपेयी से हमने बात की उनकी पत्रकारिता और मौजूदा मीडिया पर. लेकिन 20 साल से पत्रकारिता कर रहे वाजपेयी के सामने ही देश बदला, समाज बदला, राजनीति बदली और बदल गए कई समीकरण. बहैसियत एक पत्रकार वाजपेयी ने अपनी पैनी नज़र से ये सभी बदलाव देखे, इनपर लिखा और इस बदलाव के साथ चले. हमने पुण्य प्रसून वाजपेयी से पत्रकारिता के अलावा देश और समाज से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी चर्चा की. पेश है बातचीत का दूसरा हिस्सा छपास – केंद्र में मौजूदा विपक्षी पार्टी बीजेपी सरकार बना चुकी है और कई राज्यों में फिलहाल उसकी सरकार है. अपने पैतृक संगठन आरएसएस से वो विचारधारा के मामले में खुद को कितना अलग कर पाई है ?
पुण्य – अलगाव संभव ही नहीं है. आरएसएस की विचारधारा से अलग विचारधार है ही नहीं बीजेपी की. छपास – अपने दो दशक के पत्रकारिता जीवन के दौरान आप देश का सबसे बड़ा आंदोलन किसे मानते हैं.
पुण्य – इस दौरान तो देश में कोई बड़ा आंदोलन हुआ ही नहीं. मेरे ख्याल से जो आखिरी बड़ा आंदोलन हम लोगों ने देखा सुना वो जेपी का आंदोलन था.
छपास – आखिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले दो दशक में कोई बड़ा आंदोलन देखने को नहीं मिला ?
पुण्य – इस दौरान कोई बड़ा आंदोलन तो नहीं हुआ लेकिन एक उल्टी चीज ये हुई की आर्थिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई. इस प्रक्रिया ने संयोग से हमारे देश में ऐसा माहौल बना दिया था कि आंदोलन भी खरीदने और बिकने के प्रोसेस में आ गए. एक ऐसी स्थिति का निर्माण कर दिया गया इकनॉमिक रिफॉर्म द्वारा. इकनॉमिक रिफॉर्म, जिसकी काट संयोग से किसी के पास नहीं है, इसने समूचे समाज को बांट दिया है हर स्तर पर. सामाजिक विसंगतियां सबसे ज्यादा इसी दौर में हुई हैं, असमानता सबसे ज्यादा इसी दौर में हुई है. हिंदुस्तान का मतलब सिर्फ 40 से 50 करोड़ लोग हो गए हैं. बाकी लोग मायने नहीं रख रहे हैं. तो मेरे ख्याल से ऐसी नीति देश में आज़ादी के बाद कभी नहीं आई थी. जिसमें समूचा देश आपके एजेंडे में ना हो. एक लिमिटेड देश, जो उपभोक्ता के तौर पर है, वह तबका प्रमुख हो गया है. खुल्लम-खुला कहा जाने लगा कि आप अच्छे उपभोक्ता हैं तो अच्छे नागरिक हैं. ये स्थिति आ गई है जो कि काफी खतरनाक है.
छपास – 1990 के दशक में भूमंडल के अलावा मंडल और कमंडल आंदोलन हुए. क्या आप मानते हैं कि आर्थिक सुधार की प्रक्रिया ने इन आंदोलनों पर भी असर डाला ?
पुण्य – नहीं, मंडल-कमंडल जो जातिय आस्पेक्ट में चीजे निकल कर आईं, देखिए हमारे यहां पूरा का पूरा औद्योगिकरण हुआ है, जो स्थितियां डेवलप हो रही थी वो STAGNANT POINT पर आ गईं. महाराष्ट्र में ही अगर आप देखो तो 90 के दशक के बाद वहां कोई नई इंडस्ट्री नहीं आई जो बहुत रोज़गार दे सके, सारी एमआईडीसी जिले दर जिले एमआईडीसी है, सारी बीमार इकाइयों में तब्दील हो गईं, हर एमआईडीसी की ज़मीन दूसरी जगह चली गई और एमआईडीसी की पुरानी ज़मीन पर रियल इस्टेट खड़े हो गए. यह हर जगह हुआ है. इसका मतलब ये है कि हमारे पास रोज़गार के साधन खत्म होते चले गए, रोज़गार देने की स्थिति खत्म होती चली गई लेकिन इस दौर में पीढ़ी दर पीढ़ी निकल रही थी, उसे कैसे डायवर्ट किया जाए, किस तरफ उन्हें डायवर्ट किया जाए, इस चक्कर में अराजकता कहीं ज्यादा आ गई, कोई विज़न काम नहीं रहा था पॉलिटिकली.
छपास – क्षेत्रीय दलों के उदय के साथ ही लगता है आंदोलन भी क्षेत्रीय होते चले गए.
पुण्य – नहीं, होते चले जायेंगे. देखिए अचानक जब चीज बिकने और खरीदने वाले आस्पेक्ट पर आ जायेगी और मूल मंत्र मुनाफा हो जाए और स्टेट अपनी जिम्मेदारी से भाग जाए, वो भी जब हमारे यहां वेलफेयर स्टेट है, हर चीज का निजीकरण कर दिया जाए और बोले कि हम केवल निगरानी करेंगे और बाकी काम केवल प्रतिस्पर्धा के आधार पर चलेगा, इसका मतलब ये है कि हमारे संविधान का जो मूल तत्व है उसे इस दौर में हाशिए पर धकेल दिया गया कि हम आपको नहीं मानते हैं. तो यहां से एक दूसरी प्रक्रिया शुरू हुई. दूसरी ओर संसदीय राजनीति चल रही है इस देश में हर आदमी को वोट डालना है. एक सत्ता चुनी जायेगी. तो राजनीतिक तौर तरीके तो आपको पंचायत तक ले जाते हैं, लेकिन मार्केट पंचायत तक नहीं ले जाता है. मार्केट महानगर में सिमट जाता है. महानगर में आदमी वोट दे या न दे उसका जीवन बेहतर होता चला जाएगा लेकिन पंचायत स्तर पर आदमी वोट न दे तो उसका जीवन नहीं चलेगा. क्योंकि राजनीति ही रोज़गार है. दिल्ली-मुंबई में राजनीति रोज़गार नहीं है. यहां रोज़गार मुनाफे पर है और वहां राजनीति ही रोज़गार है. पंचायत का चुना जाना है उसमें भी पैसों का लेनदेन है, वोट डालने में भी आपको पैसे मिल जाएंगे।
छपास –यानि आपका कहना है कि समस्या के समाधान के लिए मार्केट को पंचायत स्तर तक ले जाना जरूरी है।
पुण्य – नहीं ले जा सकते। इसलिए नहीं ले जा सकते कि तब उनलोगों के पास इतना पैसा, इतनी पूंजी देनी होगी, अलग-अलग माध्यमों से ताकि वे चीजें खरीद सकें। तभी तो वहां बाजार पहुंचेगा। देखिये महाराष्ट्र दुनिया का सबसे बड़ा राज्य है, जहां सबसे ज्यादा शहरी गरीब हैं। उदारीकरण शुरू होने के बाद महाराष्ट्र और गुजरात में सबसे ज्यादा गांवों को शहरों में बदला गया है। गांव खत्म कर दिए गए हैं। किसानों की जमीन हथिया ली गई है। अलग-अलग माध्यमों से यह किया गया है।
छपास – गांवों को शहरों में तब्दील तो कर दिया गया है, लेकिन गांव की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है आखिर क्यों.
पुण्य – देखिए आपके घर में मुंबई में अगर ए.सी चलेगा तो हम आपको बिजली दे देंगे, लेकिन वहां गांव में किसान को सिंचाई के लिए बिजली चाहिए तो हम नहीं देंगे. इसका मतलब यह हुआ कि आज सारा कुछ उस जगह पर केंद्रित हो जा रहा है जहां पर पैसा है और जहां पैसा प्रोडक्ट को खरीदने में लग जाए. वो शहर-शहर है बाकी सब नरक हैं. ऐसा बना दिया गया है माहौल
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