मीडिया पर मनी और मुनाफा हावी
छपास – पत्रकारिता में आपने दो दशक से ज्यादा का सफर तय किया है. कैसा लगता है जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं ?
पुण्य – हमारा कोई सफर नहीं है. हम कोई सफर कर भी नहीं रहे हैं. इसको करियर मानते भी नहीं हैं हम. पत्रकारिता ही काम है, वही आराम है. मिला हुआ है सबकुछ. करियर तो उनके लिए होता है जो सोचकर आते हैं कि हम पत्रकार बन जाएं और पढ़े-लिखें. हम तो इस रूप में आए भी नहीं हैं, और किया भी नहीं है काम.
छपास – बतौर पत्रकार इस सफर में देश की राजनीति और समाज में क्या बदलाव देखने को मिले आपको ?
पुण्य – मुझे लगता है कि 1990 के दशक में देश में शुरू हुई आर्थिक सुधार की प्रक्रिया ने राजनीति और समाज को गहराई से प्रभावित किया है. इकनॉमिक रिफॉर्म ने समूचे समाज को बांट दिया है, हर स्तर पर. सामाजिक विसंगतियां और असमानता सबसे ज्यादा इसी दौर में हुई. हिंदुस्तान का मतलब सिर्फ 40-50 करोड़ लोग हो गए हैं, बाकी लोग मायने नहीं रख रहे हैं. तो मेरे ख्याल में ऐसी नीति आजादी के बाद कभी नहीं आई थी, जिसमें समूचा देश आपके एजेंडे में न हो. एक लिमिटेड देश, जो उपभोक्ता के तौर पर है, वह तबका प्रमुख हो गया है. मतलब खुले तौर पर कहा जाने लगा कि आप अच्छे उपभोक्ता हैं तो अच्छे नागरिक हैं. ये स्थिति आ गई है जो कि काफी खतरनाक है.
छपास – अख़बार से आपने पत्रकारिता शुरू की और न्यूज़ चैनल के जाने-माने नाम हैं. क्या फर्क नज़र आता है आपको दोनों मीडियम में. किसको सशक्त मीडियम मानते हैं आप ?
पुण्य – छोड़े तो दोनों को नहीं हैं हम. अख़बारों में भी हम लिखते रहते हैं. दोनों की एक अलग मान्यता है. लेकिन हमको लगता है कि TV ज्यादा मजबूत है. संयोग से उसकी जो उपयोगिता, जो जर्नलिस्टिक आस्पेक्ट हो सकता था उसको लेकर लगातार गलत तरीके से व्याख्या किया जा रहा है. उसे पूंजी पर टिका दिया गया है, और सरोकार से अलग कर दिया गया है. यह माध्यम इतना सशक्त है कि आपके बेडरूम में पहुंच जाएगा बिना आपके चाहे. लेकिन अख़बार नहीं पहुंच सकता बिना आपके चाहे
छपास – बतौर ट्रेनी आपने अपना करियर शुरू किया था. फिर मेनस्ट्रीम में आए और सहारा के हेड भी रहे. इन सभी भूमिकाओं में आपको सबसे अहम भूमिका क्या लगी.
पुण्य – मैं तो अभी भी ट्रेनी हूं. पत्रकारिता में हमेशा कुछ न कुछ सिखता रहता हूं.
छपास – सहारा में जाने और वहां से बाहर होने पर बहुत विवाद हुआ था. क्या कहेंगे इस बारे में ?
पुण्य – कोई विवाद नहीं हुआ था. एसपी भी सहारा में 7 दिन तक रहे थे. वहां केवल मैनेजमेंट और पत्रकारिता की जरूरत के बीच टकराव था और मैंने पत्रकारिता के साथ जाने को प्राथमिकता दी.
छपास – निजी ज़िंदगी के बारे में कुछ बताएं ?
पुण्य – मेरी निजी ज़िंदगी कुछ है ही नहीं. जो है वो खुली किताब की तरह सबके सामने है.
छपास – आज की पत्रकारिता के बारे में आप क्या कहेंगे ?
पुण्य – आज पत्रकारिता हो कहां रही है, सब लोग सिर्फ काम कर रहे हैं. काम के बदले में लोगों को पैसा मिलता है. पत्रकारिता भी आज पैसे और मुनाफे के नजरिए से की जा रही है. बछावत कमेटी की सिफारिश में एक पत्रकार के लिए जिन शर्तों का उल्लेख किया गया था, आज के पत्रकार उनपर खरे नहीं उतरते है. खबर भी आज एक उत्पाद बन गई है. जिस प्रकार बाजार में आज उन्ही उत्पादों को उतारा जाता है जिनके ग्राहक हो और जिनकी अच्छी क़ीमत मिलती है, उसी तरह ख़बरों को भी एक उत्पाद के नजरिए से तैयार किया जाता है.
छपास – जर्नलिज्म फॉर सेल कैसे घुसा पत्रकारिता में ये फंडा ?
पुण्य – ख़बर को जब उत्पाद के तौर पर पेश किया जाने लगा तो पत्रकारिता में जर्नलिज्म फॉर सेल का फंडा घुसा. रही सही कसर टीआरपी की जंग ने पूरी कर दी. अब तो पेड न्यूज़ को लेकर नया सवाल खड़ा हो गया है. ख़बर का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं होता है. इसमें व्यूज़ और एनालिसिस भी होना चाहिए. लेकिन पेड न्यूज़ में इस सिद्धांत का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन होता है. ख़बरों को छापने और दिखाने के लिए ख़बर से जुड़े लोगों से पैसे लिए जाते हैं. ख़ासकर चुनाव के समय मैदान में उतरे नेताओं से नोटो की गड्डियां लेकर ख़बर को प्रचार-प्रसार में तब्दील कर दिया जाता है. नेताओं का यह पैसा उसी आम जनता को किसी न किसी तरह चूना लगाकर ही बनाया जाता है, जिसके लिए चुनाव लोकतंत्र का प्रतीक और मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा है, जिसकी भूमिका वाचडॉग की है.
छपास – टीवी को बिगाड़ने में टीआरपी के खेल की क्या भूमिका रही है.
पुण्य – एक माध्यम के तौर पर टीआरपी में गड़बड़ी नहीं है, बल्कि इसे लागू किए जाने की जो व्यवस्था है उसमें खामियां है. टीआरपी को ही आधार बनाकर कंपनियां और सरकार टीवी चैनलों को विज्ञापन देते हैं. लेकिन टीआरपी तय करने की व्यवस्था काफी संदेहास्पद है. ये सारा खेल केबल सिस्टम का है. टीआरपी के डब्बे दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो में लगाए जाते हैं, जहां ज्यादा उपभोक्ता रहते हैं, और जिनकी खरीदने की शक्ति भी अधिक होती है. बिहार- यूपी के इलाक़ों में ये डब्बे नहीं लगाए जाते, जिससे टीआरपी मे इन इलाक़ों की भूमिका गौण हो जाती है. भले ही इन इलाक़ों में कोई भी चैनल क्यों न देखा जाए. न्यूज़ चैनलों में विज्ञापन का अंतर उस टीआरपी से तय होता है जिसके घेरे में पहले नंबर पर रहने वाला चैनल तो 250 करोड़ रुपए सालान तक कमा सकता है, और दसवें नंबर के चैनल को साल भर में 25 लाख जुटाने में पसीने छूट जाते हैं.
चैनल मालिक केबल सिस्टम संचालित करनेवालों को सालाना 30 से 40 करोड़ रुपए तक देते हैं क्योंकि केबल पर टीआरपी टिकी है. ये पैसे इसलिए दिए जाते हैं ताकि चैनल हर जगह दिखाई दे. यह 30 से 40 करोड़ रुपया कोई सफेद धन नहीं होता है. फिर केबल ही जब टीआरपी का आधार हो तो न्यूज़ चैनल की जान ख़बरों से ज्यादा केबल और उसके बाद टीआरपी में रहती है.
और दूसरी तरफ कोई चैनल अगर केबल ऑपरेटर को कैरिज फीस देने में सक्षम नहीं होते तो वो कितना भी अच्छा कंटेंट क्यों न दे टीआरपी में उनकी हालत हमेशा पतली रहती है.
विज्ञापन बाजार के 75 फ़ीसदी हिस्से पर 6 चैनलों आजतक, स्टार न्यूज़, इंडिया टीवी, एनडीटीवी, ज़ी न्यूज़, और आईबीएन का कब्जा है. बाक़ी 25 फ़ीसदी विज्ञापन दूसरे चैनलों को मिल पाते हैं. इनमें से कई चैनल अच्छे कंटेंट के बाद भी विज्ञापन के मोर्चे पर मात खा जाते हैं. क्योंकि टीआरपी की लिस्ट में वो कहीं नहीं टिकते हैं.
छपास – समाचार चैनलों में कंटेंट किंग बना रहे इसके लिए क्या उपाय है.
पुण्य – सरकार को इसके लिए आगे आना चाहिए. केबल सिस्टम की मनमानी पर आज रोक लगाने की जरूरत है. सरकार को चाहिए कि डीटीएच को विज्ञापन का आधार बनाए. ताकि सभी चैनलों के कंटेंट का सही आकलन हो सके. इसके लिए भले ही चैनलों से एकमुश्त राशि भी सरकार को क्यों न लेना पड़े. इससे दो फायदे होंगे. एक तो केबल ऑपरेटरों की मनमानी पर रोक लगेगी और चैनलों के कंटेंट की गुणवत्ता के बारे में सही-सही अंदाज़ा लग सकेगा. और दूसरा चैनलों को अपनी टीआरपी दुरुस्त करने के लिए जो कैरिज फीस केबल ऑपरेटरों को देनी होती है, उसपर रोक लगेगी और सरकार को भी कुछ आमदनी होगी.
छपास – हाल के दिनों में मंदी का बहाना बनाकर कई मीडिया हाउसेस में पत्रकारों की छंटनी हुई. दूसरों की हक़ के लिए आवाज़ उठाने वाले पत्रकार खुद चुप रहे, ऐसा क्यों हुआ ?
पुण्य – अब पत्रकार हैं कहां. सब केवल अपना काम कर रहे हैं. दूसरी बात यह भी है कि जो निकाले गए वह भी पत्रकार हैं और जिन्होंने निकाला वह भी पत्रकार हैं.
छपास – समाचार संपादकों पर आजकल काफी दवाब रहता है ऐसा कहा जाता है. कितना सच है इसमें ?
पुण्य – नहीं. मैं तो मानता हूं की संपादकों पर कोई दबाव होता ही नहीं है. जो लोग ऐसा बोलते हैं वो झूठ बोलते हैं. आजकल दबाव मार्केटिंक और डिस्ट्रिब्यूशन वालों पर रहता है.
छपास – शिकायत है कि आज आम आदमी न्यूज़ के सेंटर में नहीं है. तो आखिर कौन है न्यूज़ के सेंटर में.
पुण्य – पैसा, मुनाफा और उपभोक्ता.
छपास – संस्था का हित और जन सरोकार जब टकराते हैं तो क्यों संस्था हावी हो जाती है. आजकल कहा जाने लगा है कि पत्रकार तो बातें बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन खुद अपनी संस्था के लिए तमाम सारे वो काम करते हैं जिसकी सार्वजनिक तौर पर निंदा करते हैं ?
पुण्य – मैं पहले भी कह चुका हूं की आजकल पत्रकार रह ही नहीं गए हैं. लोग आजकल नौकरी करते हैं, पत्रकारिता नहीं. पत्रकारिता लोगों के लिए अब करियर मात्र रह गई है, मिशन नहीं.
छपास – रीजनल मीडिया तेजी से पांव पसार रहा है. आखिर क्यों जरूरत आन पड़ी रीजनल मीडिया की और वो भी हिंदी बेल्ट में ?
पुण्य – ज्यादातर रीजनल मीडिया में नेताओं के पैसे लगे हुए हैं. उन्हें जन सरोकार से मतलब नहीं है. नेताओं की इच्छाओं को मीडिया में तरजीह मिले, हमेशा इसी की कोशिश होती है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चार साल के शासन के दौरान अपने सुशासन के प्रचार-प्रसार में 100 करोड़ रुपए फूंक दिए. जाहिर है ये पैसे मीडिया में ही गए हैं. औसतन हर राज्य में सालाना 75 से 80 करोड़ रुपए प्रचार-प्रसार में फूंके जाते हैं. यह काला धन नहीं होता सफेद और जनता का पैसा होता है. यानी 30 हज़ार करोड़ से ज्यादा की पूंजी हर साल खुल्लम-खुल्ला मीडिया के जरिए प्रचार-प्रसार में फूंकी ही जाती है.
तो आज न तो मीडिया को और न ही राजनेताओं
को आम आदमी से कोई सरोकार रह गया है. आम जनता के पैसों का इस्तेमाल वो अपने फायदे के लिए कर रहे हैं और आम आदमी हाशिए पर चला गया है.
छपास – टीवी में कौन हावी है पैसा या संपादक ?
पुण्य – पैसा और मुनाफा अब हर जगह हावी है. अब संपादक पत्रकारित नहीं मीडिया चलाता है. तो उसकी जरूरत उस पूंजी पर जा टिकी है जिसके आसरे उसकी मौजूदगी संपादक के रूप में भी रहे और उनका संस्थान मुनाफा भी कमाता रहे.
< इंटरव्यू का दूसरा हिस्सा भी जल्द प्रकाशित होगा>
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