बिहार में रुठने और मनाने का मौसम
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों रुठे हुए नेताओं को मनाने में जुटे हुए हैं। वो चाहे उनकी पार्टी जेडीयू के नेता हों या फिर विपक्षी पार्टी आरजेडी, एलजेपी या फिर कांग्रेस के। लेकिन ऐसा करने के दौरान नीतीश जी काफी सावधानी बरत रहे हैं। नीतीश उन्हीं रुठे हुए नेताओं को गले लगा रहे हैं जिनसे उनकी पार्टी को फायदा हो….अगले चार-पांच महीनों में बिहार में विधान सभा चुनाव जो होने वाला है। चुनाव के नजदीक आते ही नीतीश मानो जातीय समीकरण को साधने में लग गए हैं। शायद ऐसा करना उनकी मजबूरी भी है और जरूरी भी है।
नीतीश जी ने बिहार में करीब-करीब अपनी सभी यात्राओं का समापन कर दिया है। राज्यभर की जनता को उन्होंने धुम-धुमकर अपनी सरकार की उपलब्धियों से परिचित करा दिया है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खबरों में तो नीतीश की वाहवाही पहले से ही जमकर हो रही है। लेकिन सुशासन बाबू को लगा कि जबतक बिहार की जनता को उनके पास जाकर अपना लेखा-जोखा न बता दें, तबतक उनका काम अधूरा रहेगा। सो नीतीश जी ने कई गांवों, कस्बों और शहरों का दौरा किया।
लेकिन शायद इन दौरों के दौरान नीतीश को अहसास हुआ कि आगामी विधान सभा चुनाव में फिर से परचम लहराने के लिए महज काम ही काफी नहीं है बल्कि जातीय समीकरण को भी साधना जरूरी है। पिछले साल हुए उपचुनाव में जेडीयू का जो हश्र हुआ था वो भी कहीं न कहीं मुख्यमंत्री के जेहन में ताजा होगा। फिर राजनीति के चाणक्य नीतीश यूं ही थोडे न कहे जाते हैं…सो नीतीश कुमार विधान सभा के लिए कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं और उनके सामने एकमात्र चुनौती है मिशन २०१०।
वैसे भी कहा जाता है कि जब आप सरकार चला रहे हो तो पांच साल का पहला कार्यकाल अपनी जनता और अपने राज्य, देश या इलाके का विकास करें। दूसरे और तीसरे कार्यकाल के दौरान उन नीतियों को हर हाल में लागू करने में लगाना चाहिए और चौथे कार्यकाल की शुरुआत से अपने लोगों को अपने कार्यों से अवगत कराना शुरू कर देना चाहिए। अपने कामों का डंका पीट-पीटकर बताना चाहिए। नीतीश जी के क्रियाकलापों पर नज़र दौडायें तो इन सिद्धांतों पर नीतीश जी पूरी तरह से खरे उतरे हैं। यही वजह है कि अब उऩका पूरा ध्यान विधान चुनाव में एक बार फिर से जेडीयू और बीजेपी गठबंधन का पताका फहराने का है।
सबकुछ करने के बाद नीतीश के सामने अब एक ही काम रह गया है उनकी पार्टी और उनके गठबंधन को फिर से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने में अहम योगदान देने वाले नेताओं की तलाश। नीतीश ने सबसे पहले जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार को जेडीयू में शामिल कराकर इसकी शुरुआत की। जब दूसरी पार्टी के नेताओं को नीतीश जी मना रहे हैं तो भला अपनी पार्टी के निलंबित सांसदों को भला कब तक कठघऱे में खड़ा रखते। सो उन्होंने जगदीश शर्मा और पूर्णमासी राम का निलंबन समाप्त कर दिया। दोनों जेडीयू के सांसद हैं जिन्हें विधान सभा चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर निलंबित कर दिया था।
यही नहीं नीतीश ने सीमांचल और मुसलमानों के वोट की जरूरत को भी खूब पहचाना है। तभी तो आरजेडी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन को नीतीश ने जेडीयू में शामिल करने में कोई देरी नहीं की। राजपूतों का वोट बटोरने के लिए नीतीश सहरसा जेल में बंद आनंद मोहन की माता जी से भी आशीर्वाद ले आए। नीतीश कुमार के इस तरह से मिलने-जुलने को लेकर विपक्ष ने अपनी प्रतिक्रिया भी दी और कहा कि नीतीश ये सारा कुछ वोट लेने के लिए कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार में चार साल रहते हुए उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया और अब चुनावी साल में ऐसा करना महज नौटंकी है। जबकि जेडीयू ने इस टिप्पणी के जवाब में कहा कि नीतीश कुमार को अब समय मिला है इसलिए वो लोगों से मिलजुल रहे हैं तो इसमें कोई मायने निकालने की जरूरत नहीं है। जेडीयू का तर्क अपनी जगह है लेकिन ये पब्लिक है सब जानती है…कि नीतीश आखिर मेलमिलाप में क्यों लगे हुए हैं..
कभी नीतीश से साये की तरह चिपके रहने वाले अरुण कुमार नीतीश कुमार को उनके ही गढ़ नालंदा में ही ललकारने लग गए थे लेकिन नीतीश का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाए।
यह ऐसा समय है जबकि नीतीश कुमार और अरुण कुमार दोनों को एक दूसरे की मदद की जरूरत है। नीतीश एक दमदार भूमिहार नेता की तलाश में थे तो दो संसदीय चुनावों में शिकस्त का सामना कर राजनीतिक बियाबान में पहुंच चुके अरुण कुमार में अब फिर से राजनीति की मुख्यधारा में आने की बेचैनी थी। दोनों को एक-दूसरे का कितना लाभ मिल पाता है, इसका जवाब तो चुनाव में मिल ही जाएगा।
लालू रामविलास का सहयोग पाकर नीतीश कुमार को चुटकियों में मसलने का दंभ भरने लगे थे लेकिन नालंदा में उनको शिकस्त का सामना करना पड़ा। रामस्वरुप प्रसाद से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार वो चुनाव हार गए थे। अरुण कुमार ने फिर कांग्रेस का दामन थामा है। कारण यह रहा कि पिछले संसदीय चुनावों में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने अरुण कुमार के लिए जहानाबाद सीट छोड़ने से मना कर दिया था। लोजपा में राष्ट्रीय महासचिव रह चुके अरुण कुमार चुनाव लड़ने के लिए इस कदर बेचैन हो उठे कि उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का दामन थाम लिया था। लेकिन यहां भी किस्मत ने अरुण कुमार को दगा दे दिया।
मुंगेर के सांसद राजीव रंजन सिंह उ़र्फ ललन सिंह की बगावत के बाद नीतीश कुमार को भी एक सशक्त भूमिहार नेता की ज़रूरत थी, जिसकी बिरादरी में अपनी पहचान हो. ललन सिंह के इस्ती़फे के बाद भूमिहार बिरादरी के विजय चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. परंतु चौधरी के अध्यक्ष घोषित होने के बाद जब लोगों ने उनकी जाति पूछी तो स्थिति हास्यास्पद हो गई। अब उसी गैप को भरने का प्रयास किया जा रहा है। बताया जाता है कि ललन सिंह के इस्ती़फे के बाद नीतीश कुमार ने राज्यसभा सदस्य किंग महेंद्र के ज़रिए अरुण कुमार को पाले में लाने की कोशिश की थी. किंग महेंद्र के कई प्रयासों के बावजूद अरुण कुमार प्रस्ताव को नकारते रहे. अरुण कुमार और किंग महेंद्र न स़िर्फ स्वजातीय हैं, बल्कि दोनों का गृह ज़िला भी एक ही है। महेंद्र पिछली बार जदयू के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे थे।
चुनावी साल में जेडीयू अपने दो सांसदों जगदीश शर्मा और पूर्णमासी राम के निलंबन को भी वापस ले लिया है। जगदीश शर्मा जहानाबाद से और पूर्णमासी राम गोपालगंज से पार्टी के लोकसभा सदस्य हैं। पिछले साल सितंबर में बिहार में हुए विधानसभा उप चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में इन दोनों सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। जगदीश शर्मा का मगध और पटना के इलाकों में अच्छा खासा प्रभाव माहै। पार्टी ने शर्मा को तब कारण बताओ नोटिस जारी किया जब उनकी पत्नी शांति शर्मा उप चुनाव में घोसी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुई। जबकि जदयू ने वहां अपना उम्मीदवार खड़ा किया था। इस सीट से शर्मा करीब तीन दशकों से ज्यादा समय से चुने जाते रहे थे। उनके लोकसभा चुनाव जीतने के कारण यह सीट रिक्त हुई थी। शांति शर्मा हालांकि यहां से विजयी रही। वहीं गोपालगंज के सांसद पूर्णमासी राम को पार्टी की नाराजगी का सामना तब करना पड़ा जब पार्टी ने उनके पुत्र अजय कुमार को टिकट नहीं दिया। वह जदयू उम्मीदवार के खिलाफ़ राजद के टिकट पर उपचुनाव में बगहा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतर गये। हालांकि वह चुनाव हार गये। इन दोनों नेताओं के संबंधियों को इसीलिए पार्टी का टिकट नहीं मिला
पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहम्मद तस्लीमुद्दीन भी अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी में जदयू में शामिल हो गए हैं। कुमार ने उनके शामिल होने का स्वागत करते हुए कहा था कि वे राजद से सही पार्टी में आ गए हैं। राजद के पूर्व सदस्य तस्लीमुद्दीन ने पिछले साल अगस्त में पार्टी छोड़ दी थी। नीतीश कुमार ने कहा था कि तस्लीमुद्दीन हमेशा से बिहार के सीमांचल जिलों के विकास के बारे में चिंतित रहे हैं। जद यू में उनके शामिल होने से इस इलाके में विकास की गति तेज होगी।
चुनाव से पहले नीतीश कुमार को वर्षों बाद अपने पुराने साथी पूर्व सांसद आनंद मोहन याद आए। नीतीश कुमार आनंद मोहन के घर सहरसा के पंचगछिया गए और आनंद मोहन की भतीजी को उसके शादी के बाद आर्शीवाद दिया। साथ ही आनंद मोहन की मां से उनका पैर छूकर आशीर्वाद भी लिया। जाहिर है नीतीश के इस यात्रा की से कोसी इलाके की राजनीति गर्मा गई है। गौरतलब है कि 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन और उनकी पत्नी लवली आनंद दोनों ही नीतीश के साथ हुआ करते थे। मगर नीतीश के सत्ता में आने के बाद दोनों के बीच दूरियां बननी शुरु हो गई। नीतीश की इस यात्रा से आनंद मोहन और उनकी पत्नी लवली आनंद का जदयू में शामिल होना तय माना जा रहा है।
दरअसल जदयू के पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह द्वारा नीतीश के खिलाफ खुलकर बगावत करने के बाद नीतीश को किसी ऐसे चेहरे की तालाश थी जो प्रभुनाथ सिंह की जगह ले सके। प्रभुनाथ सिंह और आनंद मोहन दोनों स्वजातीय हैं और दोनों ही अपने इलाके के कद्दावर नेता माने जाते रहे हैं। माना जा रहा है कि जो राजपूत वोट बैंक प्रभुनाथ सिंह के जदयू से अलग होने पर खिसक रहे थे उसकी भरपाई आनंद मोहन के आने से पूरा हो जाएगा। आनंद मोहन कोसी इलाके में बाहुबली माने जाते हैं। उनपर कई अपराधिक मुकदमें दर्ज हैं। फिलहाल आनंद मोहन गोपालगंज के डीएम जी.कृष्णैया हत्याकांड मामले में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं। तो क्या हुआ नीतीश जी को चुनाव में फायदा पहुंचना चाहिए। बस…
पता नहीं अगला खुशनसीब नेता कौन होगा, जिसको नीतीश जी सत्ताधारी जेडीयू में शामिल करने के लिए न्यौता लेकिन फिलहाल नीतीश जी नेताओं को भले ही मनाने में जुटे हुए हैं लेकिन नीतीश की पहली परीक्षा तो टिकट बंटबारे के समय होगी, जब टिकट बंटवारे से नाराज उनके नेता रुठने लगेंगे तब देखना होगा, नीतीश उनको कैसे मनाते हैं……
चुनाव नजदीक देखकर, नेता हुए चौंकन्ने
टिकट मिलने की आस जहां से, लगे उधर दौड़ने
जेडीयू हो या हो कांग्रेस, आरजेडी हो या हो एलजेपी
सभी पार्टियों के नेताओं का है एक ही सपना
अगले विधान सभा में सीट हो अपना
लेखक-रजनीश कांत
(यह आलेख रजनीश कांत के ब्लॉग paiseleloसे लिया गया है)
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