लोकतंत्र के लिए अमंगल रहा मंगलवार
बिहार विधानसभा में मंगलवार के दिन जो कुछ हुआ वो लोकतंत्र के लिए एक अमंगल दिन था। हमारे देश के रहनुमाओं ने लोकतांत्रिक पद्धति को इसीलिए अपनाया ताकि हर किसी की बात को तवज्जो दी जा सके। लेकिन जब किसी दूसरे की बात के प्रति सम्मान की भावना खत्म हो जाती है जब वो लोकतंत्र नहीं रह जाता और तब वो ताकततंत्र में बदल जाता है। बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष ने जिस तरह एक-दूसरे पर कुर्सी और टेबल फेंका वो जनप्रतिनिधियों के लिए शर्म की बात है।
मामला ट्रेजरी घोटाले का था, और पटना हाईकोर्ट ने लालू यादव की आरजेडी और नीतीश कुमार की जद(यू)-बीजेपी गठबंधन दोनों को दोषी करार दिया था। पटना हाईकोर्ट ने वित्तीय वर्ष 2002-03 और 2007-08 के दौरान ट्रेजरी से हुई निकासी में गड़बड़ी की ओर इशारा किया था। 2002-03 में आरजेडी की राबड़ी देवी की सरकार थी और 2007-08 में वर्तमान नीतीश कुमार की सरकार थी। यहां दोनों पार्टियां और गठबंधन आत्ममंथन करने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों में उलझे हुए थे। दोनों में ये दिखाने की होड़ लगी थी किसका कुर्ता ज्यादा सफेद है और किसका कम। दरअसल दोनों को अगले चार-पांच महीने के भीतर ही चुनावी जंग में जाना है। इसलिए जनता के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने का भला इससे अच्छा मौका क्या मिलता। सो टूट पड़े पूरी ताकत के साथ लोकतंत्र के मंदिर में। उन्हें लोकतांत्रिक लोकाचार का जरा भी ध्यान नहीं रहा। दुखद बात ये रही कि इस घटना पर किसी भी दल के नेता को कोई अफसोस नहीं रहा। उन्हें इस बात की भी चिन्ता नहीं थी कि पहले से ही बदनाम बिहार को और लोग और ज्यादा बदनाम करेंगे।
अब बात करें ट्रेजरी निकासी की। ट्रेजरी निकासी में घोटाला कोई नयी बात नहीं है। कभी पकड़ में आती है कभी नहीं। लेकिन ये होता हर साल है। मार्च लूट शब्द का जो असली मतलब समझते होंगे वो इस घटना को अच्छी तरह से समझ सकते हैं। सरकार का हर विभाग और हर विभाग महकमा अपने कोटे की राशि वित्तीय वर्ष खत्म होते-होते निकालना चाहता है। चाहे वो काम हुआ हो या नहीं। कई बार तो 31 मार्च को इतनी राशि की निकासी होती है जितनी पूरे साल भर में नहीं होती। ये पूरा-पूरा जनता के पैसे की लूट का मामला होता है। आखिर ये समझ से परे है कि जो काम 364 दिन में नहीं हो पाता वो एक ही दिन में भला कैसे हो जाता है। मतलब साफ है कि वो काम कागजों में होता है और पैसे अफसरों, राजनेताओं और ठेकेदारों की जेब में जाता है।
सवाल है कि क्या इसीलिए जनता वोट देकर इन राजनेताओं को भेजती है। क्या इसीलिए कि वो उन्हें बात-बात में बेवकूफ बनाता रहे और जनता उन्हें जाति-बिरादरी और धर्म के नाम पर वोट देती रहे। लोकतंत्र का जिस तरह से नेताओं ने मजाक बनाया है उसकी वजह से कई लोगों का विश्वास लोकतांत्रिक प्रक्रिया से डगमगाने लगता है। पांच साल के लिए सत्ता में चुने जाते ही राजनेता समझते हैं कि चार साल तक खूब लूटो और खाओ। बाकी के दिन कुछ काम करो कुछ पॉकेट में डालो। अगर जनता इससे भी नहीं समझती तो वोट के दिन उसके खाने-पीने का का इंतजाम कर दो। लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये कब तक चलेगा। जनता भी अब पहले से होशियार हो गयी है। राजनेताओं को मजा चखा देगी।
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