हेमचंद्र पांडे की मौत और पत्रकारों की भूमिका
पत्रकार हेमचंद्र पांडे की मौत के बाद पत्रकार बिरादरी के कुछ हलकों में एक मंथन शुरू हुआ है। आज के समय में पत्रकारों की भूमिका को लेकर। विभिन्न संदर्भों में यह सवाल बार-बार उठाए जाते हैं। और हर बार बात वहीं पहुंच कर समाप्त हो जाती है कि आज की पत्रकारिता नई पूंजी और राजसत्ता की दलाल है। तर्क दिया जाता है कि कॉरपोरेट मीडिया में जनपक्षधरता के लिए कोई स्थान नहीं। पत्रकार मजबूर हैं संपादकों के सामने। संपादक मजबूर हैं मालिकों के सामने। इस श्रेणी के प्रश्नों की श्रृंखला आगे बढ़ाई जाती है और बैठकों के बाद नतीजा कुछ नहीं ढाक के वही तीन पात। क्या मजबूरियों की इस श्रृंखला का केवल इतना ही सच है? क्या पत्रकार वाकई केवल संपादकों के हाथों, मीडिया घरानों के मालिकों के हाथों मजबूर हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि बाहर की इन ओढ़ी हुई मजबूरियों के पीछे, अपने भीतर की कोई मजबूरी छुपाई जा रही है? कॉरपोरेट मीडिया के हाथों की कठपुतली बन अनाप-शनाप पैसा कमाने की मजबूरी। हवाई यात्राओं और देश-विदेश में शानदार छुटि्टया मनाने की मजबूरी। सत्ता के गलियारों में अपने लिए जगह बनाने की मजबूरी। इन मजबूरियों का रोना कहीं न कहीं अपनी महत्वाकांक्षाओं के हाथों अपने जमीर को बेचने की कहानी है।
किसी पत्रकार का यह कहना कि मैं मजबूर हूं, मैं सच के साथ खड़ा नहीं हो सकता, वैसा ही जैसे कोई डाक्टर कहे मैं मजबूर हूं – मैं मरीज का सही इलाज नहीं कर सकता। ऐसे में डाक्टर से तपाक से कहा जा सकता है कि तब आप डाक्टरी का पेशा छोड क्यों नहीं देते। वैसे ही पत्रकार से कहा जा सकता है कि यदि आप सच के साथ खड़े नहीं हो सकते तो पत्राकारिता का पेशा छोड क्यों नहीं देते? पैसे कमाने के लिए ऐसे भी तो पेशे हैं, जिनमें इस तरह के अंतर्विरोध का सामना नहीं करना पडता । कोई और पेशा क्यों नहीं?
जो पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारिता के सिवा सबकुछ कर रहे होते हैं, उनसे दिक्कत दूसरी तरह की है। उनकी निशानदेही भी आसान है। साथ ही वे अपने लिए जनता से वैधता की कोई उम्मीद नहीं करते। दिक्कत उनसे है जो कॉरपोरेट मीडिया की मलाई खा-खाकर मोटाते भी रहते हैं, और इधर-उधर मंच हथिया कर मालिकों और संपादकों की मजबूरी का रोना रोकर अपने लिए जनता से संवेदना और वैधता ढूंढने की कोशिश करते हैं। वैसे पत्रकारों को स्वयं से कुछ ऐसे सवाल करने चाहिए जो उनकी जनपक्षधरता को ज्यादा सगुण और साकार रूप देने में मदद कर सके। इस अंतर्विरोध से बचने का एक उपाय वे पत्रकार सुझाते हैं, जो कारपोरेट मीडिया घरानों के बड़े-बड़े जहाजों से किनारा कर अपनी जनपक्षधरता की रक्षा करते हुए वैकल्पिक मीडिया की किसी छोटी डोंगी पर सवार हो जाते हैं।
यह जानते हुए वर्षों बीत चुके कि सत्ता और संचार का चरित्र पूरी तरह से बदल चुका है। इसकी आलोचना करते-करते भी बहुत दिन बीते। देश आज जिस तरह के संक्रमण से गुजर रहा है, उसमें आलोचना भर से काम नहीं चलेगा। आलोचना से आगे बढ़कर ऊर्जा का निवेश विकल्प और उसकी रचना में करना होगा। आज फिर देश उस दौर में आ पहुंचा है, जब उसे अर्थपूर्ण पत्रकारिता की जरूरत है। आज की मीडिया के सामने एक ओर लगातार बढ़ते मुनाफे और आर्थिक वृद्धि की तरपफदारी का दबाव है, दूसरी ओर न्याय और समता के लोकतांत्रिक आग्रह हैं। नवउदारवाद के दबाव में लोकतांत्रिक आग्रह कमजोर पड़े हैं। स्वतंत्र प्रेस के सामने यही निर्णय का बिन्दु है। कुछ खास लोगों के लिए अथाह लाभ या सभी के लिए न्याय के बीच चुनाव आज के मीडियाकर्मी का चरित्र तय करेगा। न्याय और लोकतंत्र के पक्ष में लगातार बढ़ती भूमिका ने ही आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता को व्यापक जनस्वीकृति दिलवायी। आज भी देश की आधी से अधिक जनता के हाथ में अखबार नहीं पहुंचा है। जन-सरोकारों और लोकतांत्रिक दबावों से निर्देशित होना मीडिया के लिए मिशन नहीं सबसे बडा व्यवसायिक हित भी है।
ऐसे में वैकल्पिक राजनीतिक चिंतन से जुड़े लोग एक उम्मीद यह भी करते हैं कि जनपक्षीय पत्रकारिता को मजबूत और व्यापक बनाया जा सकता है। वेनेजुएला की मीडिया में जन-नियंत्रण का क्रांतिकारी उदाहरण हमारे सामने है। इस लातिनी अमरीकी देश में जनता ने एकजुट होकर प्राइवेट मीडिया को खारिज कर दिया और पूरे देश में सामुदायिक मीडिया का एक नेटवर्क तैयार किया गया है। अब यही सामुदायिक मीडिया वहां सक्रिय है। हांलाकि अपनी विराटता और विविधता के कारण भारत में वेनेजुएला जैसे प्रयोग का दोहराव मुश्किल है, लेकिन यह जनपक्षधर मीडियाकर्मियों की रचनात्मक कल्पना को जरूर उकसाता है। यह नामुमकिन नहीं कि भारत में विकल्पों के लिए काम कर रहे अनेक मीडियाकर्मी और संस्कृतिकर्मी लेखन और प्रकाशन के क्षेत्रा में नए-नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित हों। ऐसे प्रयोग भारत जैसे बड़े देश में मीडिया परिदृश्य को एक सिरे से बदल तो नही देंगे, लेकिन स्वयं मुख्यधारा की मीडिया को बदलने का दवाब जरूर बनाएंगे।
लेखक-मेधा
जनसत्ता से साभार
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